Monday, 10 October 2011

शिक्षा का बेड़ा गर्क किसने किया ?



 बाहर के अन्धकार को मिटाने के लिए कई प्रकाशश्रोत हैं-दीया से लेकर सूर्य तक. किंतु अंतर के अन्धकार को सिर्फ शिक्षा ही मिटा पाती है. वह शिक्षा ही है, जिससे मनुष्य स्वयं से लेकर ब्रह्म को जानता है. वह शिक्षा ही है, जो मनुष्य को जानवर से अलग करती है.
वैदिक काल में शिक्षा का यही रूप था. जब गुरूकुल में शिष्य न सिर्फ शास्त्र व शस्त्र आदि की शिक्षा ग्रहण करते थे, बल्कि अपने जीवन, परिवार व समाज से लेकर सम्पूर्ण सृष्टि में किस तरह अपना योगदान कर सकते हैं, वह शिक्षा भी प्राप्त करते थे. गुरुवर सिर्फ पाठ्य विषय पढ़ाना ही अपना कर्तव्य नहीं मानते थे, वरन शिष्य का सर्वंगीण विकास उनका ध्येय होता था, ताकि वह अपना कर्तव्य भली-भांति निभा सके.
मगर शिक्षा का जो स्वरूप आज हमारे सामने है, उसने मानव समाज को रेसकोर्स में लाकर खड़ा कर दिया है. बच्चे रेस का घोड़ा हैं और माता-पिता रेस में दाँव लगाने वाले खिलाड़ी. जैसे घोड़े पर दाँव लगाने वाला चाहता है कि उसका घोड़ा सबसे आगे रहे, वैसे ही माता-पिता की हरसंभव कोशिश होती है कि उनके बच्चे हर परीक्षा में सबसे आगे रहें. इस वजह से बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है. जो शिक्षा माता-पिता के विचार को इतना दबावपूर्ण बना रही है, बच्चों पर उसका कितना विपरीत असर डालती होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता. आए दिन सुनने को मिलता रहता है कि परीक्षा के तनाव से छात्र ने आत्महत्या कर ली. परीक्षा में कम नंबर आने या फेल जाने के बाद विद्यार्थी ने अपनी जानलीला समाप्त कर ली. शिक्षा का काम है व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाना. भय से आनंद की ओर ले जाना. फिर ये कैसी शिक्षा है,जो जाने-पहचाने भय और कुंठा की गर्त में खींच रही है. और विडंबना यह है कि हम जानते हुए भी खिंचे चले जाने को मजबूर हैं, सही वाक्य होगा, हम खिंचे जाने को उतावले हैं.
यह शिक्षा अक्षर ज्ञान से शुरू होकर रोटी-रोजगार हासिल करने तक केन्द्रित है. यह पैसे कमाने का कौशल्य तो देती है, मगर जीवन का सच्चा सुख पाने का मार्ग नहीं दिखाती. क्या शिक्षा का कार्य सिर्फ रोटी देना है? पशु-पक्षी व अन्य जीव तो बिना शिक्षा लिए ही पेट भर लेते हैं. फिर शिक्षा बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए होड़ क्यों? 
शिक्षा का वास्तविक अर्थ है जीवन को आसान और आनन्दमय बनाना, परहितकारी बनाना. व्यक्ति सिर्फ स्वयं के लिए न जीकर पूरी सृष्टि के लिए जिए. वह दूसरों के काम आए. लेकिन आज की शिक्षा-व्यवस्था मनुष्य को आत्मकेन्द्रित बना रही है. वह सिर्फ अपने लिए जीना चाहता है. वह सबका जीवन अपने मनमुताबिक जीने की कभी तृप्त न होनेवाली लालसा से भरा है. इसी चाहत ने मानवीय मूल्यों का ज़बर्दस्त क्षय किया है. चारों तरफ भ्रष्टाचार, अनैतिकता और हिंसक प्रवृतियों का बोलबाला है.   शिक्षा मनुष्य में नैतिक मूल्य भरती है, मगर ये कैसी शिक्षा है,जो हमें लालची,स्वार्थी और भ्रष्टाचारी बना रही है! जो जितना पढ़ा-लिखा, उतना ही अमानवीय!
हमारी वर्त्तमान शिक्षा व्यवस्था हमें अच्छा डॉक्टर, इंजीनियर, आइपीएस और आइएस तो बनाती है, मगर अच्छा इंसान नहीं बनने देती. विद्यादान कभी सबसे बड़ा दान हुआ करता था, किंतु आज शिक्षा सबसे बड़ा व्यवसाय बन गई है.रुपयों का लाभ सबको दिख रहा है,मगर मानवीय मूल्यों का अपूरणीय नुकसान क्यों किसी को दिखाई नहीं दे रहा ?!
गुरू जिनका दर्जा कभी भगवान से भी ऊपर कहा गया,आज वो गुरू अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए बस नौकरी कर रहा है. बच्चों ने क्या पढ़ा इससे उसे कोई सरोकार नहीं, महीने के आखिर में वेतन मिल जाय. क्या शिक्षा आज के गुरू का पैशन है? नहीं. उन्होंने इसलिए शिक्षण को चुना क्योंकि इसी क्षेत्र में जीविकोपार्जन के लिए नौकरी मिली.
शिक्षा के क्षेत्र में आई इस विकृति को दूर करने और शिक्षा के वास्तविक स्वरूप को पुनर्स्थापित करने की दिशा में अब थिएटरकर्मी भी जुट गए हैं. थिएटर को आमतौर पर प्रस्तुतियों-प्रदर्शनों और मनोरंजन तक सीमित कर दिया गया है, किंतु थिएटर ऑफ रेलेवेंस ने थिएटर को जीवन में बदलाव से जोड़ा है. थिएटर ऑफ रेलेवेंस अब शिक्षा के बदले और बिगड़े स्वरूप को संवारने की मुहिम शुरू की है.
थिएटर ऑफ रेलेवेंस के जनक मंजुल भारद्वाज ने वर्त्तमान शिक्षा पद्दति की इस विकृति को पहचाना है और उससे हो रहे तात्कालिक और दूरगामी दुष्प्रभाव और उससे बचने के उपाय को शिक्षा-समाज के बीच लाने का सूत्र प्रस्तुत किया है. उन्होंने शिक्षकों,छात्रों और पालकों के साथ-साथ पूरे समाज को इस अभियान से जोड़ा है. शिक्षा का अर्थ क्या है? शिक्षित होने का मतलब क्या है? शिक्षक की भूमिका क्या है? पालक की भूमिका क्या है? आदि विषयों पर कार्यशालाओं में लगातार काम कर रहे हैं.इसका बेहतर प्रतिसाद भी मिला है. बच्चों से लेकर पालकों-शिक्षकों सहित पूरे स्थानीय समाज में जागरूकता आ रही है.
थिएटर ऑफ रेलेवेंस परीक्षा में प्राप्त अंक प्रतिशत आधारित शिक्षा की जगह छात्र के मूल्य आधारित शिक्षा पर बल दे रहा है. रोजगारोन्मुखी शिक्षा को वह मूल्यपरक शिक्षा तक विस्तार देने में अग्रसर है थिएटर ऑफ रेलेवेंस.
थिएटर ऑफ रेलेवेंस की कार्यशालाओं में व्यक्ति के जन्म के औचित्य से लेकर उसकी पारिवारिक-सामाजिक भूमिका तक थिएटर के माध्यम से विद्यार्थियों सहित पालकों-शिक्षकों के समक्ष उपस्थित की जाती है. आत्मविश्वास,संवेदनशीलता,सामाजिक-राष्ट्रीय उत्तरदायित्व आदि भावबोध शिक्षा के वास्तविक स्वरूप से साक्षात्कार कराते हैं और एक सम्पूर्ण मनुष्य का निर्माण करते हैं. एक ऎसा मनुष्य जो अपने साथ-साथ पूरे समाज की भलाई के लिए चाहता है. शिक्षा की यही तो भूमिका है कि मनुष्य को ‘स्व’ से निकालकर ‘समस्त’ से जोड़ देता है.
धनंजय कुमार  
  





Wednesday, 7 September 2011

बिन्द


मेरे गाँव का नाम बिन्द है. यह बिहार के नालन्दा जिला का एक प्रखण्ड भी है,सौभाग्य से इसके गँवई सौन्दर्य पर अबतक शहरी ग्रहण नहीं लगा है.गाँव के चारो ओर हरियाली का बसेरा है.खेत बेहद उपजाउ और किसी भी फसल के लिए उप्युक्त है. गाँव के पूरब और पश्चिम,दोनो तरफ बरसाती नदी बह्ती है,जो गाँव की सुन्दरता को और भी निखारता है.
इस गाँव की आबादी दस हज़ार से अधिक है. ग्रामीणो का मुख्य व्यवसाय खेती है,लेकिन मॉनसून पर निर्भरता की वजह से खेती दशको से घाटे का व्यवसाय बनी है. इस वजह से पहले बडे किसानो ने अपने बाल-बच्चो को खेती के बजाए नौकरी करने के लिए प्रेरित किया,तो अब छोटे किसानो के बच्चे भी शहर आने का कोई अवसर नहीं छोड रहे. नतीजा है सैंकडो एकड खेत जैसे-तैसे जोते-बोए जाते हैं.शायद ही कोई किसान पूरी खेती करता है.क्योंकि खेती के लिए मज़दूर नहीं मिलते.
बिन्द के प्रखण्ड बनने से गाँव के लोगों को प्रशासकीय कार्यो मे बेशक सहूलियत हुई है, किंतु गाँव के सौन्दर्य के बिगडने का खतरा निकट आ गया है. शहर की ओर पाँव पसारते गाँव की ज़मीन दिनोंदिन महँगी होती जा रही है, बाहर के लोग ज़मीन मे पैसा फँसाने का अच्छा समय देख गिद्ध की तरह मँडराने लगे हैं. चूँकि हमारी सरकार के पास गाँव के सौन्दर्य को बचाए रखने की कोई योजना नहीं है, इसलिए मैं भयभीत हूँ कि मेरा ग़ाँव भी कल शहर बनने के क्रम मे अपनी प्रकृति,सहजता और खासियत को खो देगा..

धनंजय कुमार 

Tuesday, 9 August 2011

our educational policy is task oriented


 gekjh f”k{kk uhfr VkLd vksfj,aVsM gS] blh otg ls gekjh fnup;kZ Hkh VkLd vksfj,aVsM gks xbZ gSA ge e”khu ugha balku gSaA ge Hkkoukvksa ls pyrs gSaA tcfd e”khu esa Hkkoukvksa dk vkosx ugha gksrkA og Mkys x, dekaM ds vuqlkj dk;Z djrk gSA blfy, mlds }kjk fd, x, dke esa ,d:irk gksrh gSA exj euq’; ds dke esa izk;% ,d:irk ugha gksrhA D;ksafd og dekaM ds ctk; cqf)]foosd vkSj Hkkoukvksa ds la;ksx ls dk;Z djrk gSA blh dkj.k fdlh e”khu dh rjg dfo ges”kk ,d lh dfork,a ugha fy[krkA deZpkjh e”khu dh rjg yxkrkj /kaVksa dke ugha dj ldrkA fo|kFkhZ yxkrkj ugha i<+ ldrkA mldh bPNk i<+kbZ NksM+ dHkh fQYe ns[kus] pkV [kkus ;k nksLrksa ds lkFk eLrh djus dh gks ldrh gSA ,slk djuk t:jh Hkh gS] mlds fy, ,djlrk cksfj;r iSnk djrh gS],slh fLFkfr esa ml fo|kFkhZ dk i<+kbZ ls eu mpV tkrk gSA og pkg dj Hkh ugha i<+ ldrk gSA tcju i<+sxk Hkh rks ikB Bhd ls ;kn ugha gksxkA cseu ls fd;k x;k dke dHkh vPNk ugha gksrk];g ge lHkh tkurs gSaA
gekjh f”k{kk uhfr cPpksa dks cPpk ugha e”khu le>rh gS] blhfy, mls balku cukus ds ctk; O;oLFkk dks <ksus okyk xqyke cukrh gSA f”k{kd dgrs gSa]bruk lc i<+ yks ijh{kk esa ikl gks tkvksxsA ekrk&firk dgrs gSa bathfu;j cu tkvks] vPNk iSlk dekvksxs] vPNh yM+dh ls “kknh gksxh]thou lq[k ls chrsxkA cspkjk cPpk vkKkdkjh cu ekrk&firk vkSj f”k{kd dh ckr lqurk gS]bathfu;j rks cu tkrk gS]exj lq[k ugha izkIr dj ikrkA og eglwl djrk gS xqyke cu x;k gSSA viuh ethZ dk dqN Hkh ugha dj ldrkA ckWl dh bPNk ds cxSj vkWfQl ugha NksM+ ldrkA og ukSdjh Hkh ugha NksM+ ldrkA ukSdjh NksM+ nsxk rks djsxk D;k] bathfu;fjax ds vykok mls vkrk gS D;k\ tSls e”khu flQZ ogh dj ldrk gS]ftl dke ds fy, mls cuk;k x;k gSA xsgwWa ihlus okyh e”khu larjs dk twl ugha fudky ldrhA

Monday, 8 August 2011

ग्रामगीत


ग्रामगीत


 ge /kkj cusa]vk/kkj cusa]
  ge l`f’V dk J`axkj cusaA
ge vkl cusa] fo”okl cusa]
gj ekSle esa e/kqekl cusaA

,d gS lwjt] pk¡n ,d gS]
/kjrh vkSj vkdk”k ,d gSA
,d xzke ds ge gSa oklh]
,d y{; ds ge vfHkyk’kh]
Lkq[kh jgsa ge] Qwysa&Qysa]
vkxs c<+sa vkSj c<+rs jgsaA

fdruk lqanj xk¡o gekjk]
I;kjk&I;kjk unh fdukjkA
pg¡qvksj gfj;kyh Mksys]
gok esa iaNh feJh ?kksysA
dgha nhi tys]dgha jax mM+s]
dgha nknk&iksrk lax pysA

vius xk¡o dk ikuh&feÍh]
izseflDr tSls dksbZ fpÎhA
fnu fy[krk gS “kkS;Zxhr]
tgk¡ xkrh jkr dksbZ yksjhA
cjxn ihiy ,lh vius]
fcu [kkV gh vk,¡ e/kqj liusaA

viuk xk¡o Hkh gS QjVkby]
xyh&xyh vc gS eksckbyA
“kgj dk e¡qg fQj D;ksadj ns[ksa]
viuh fdLer [kqn gh fy[ksaA
HkhM+ ugha] ge psgjk cusa]
gj lDlsl dk lsgjk cusaA

धनंजय कुमार